Table of Contents
Toggle📚 NCERT के अनुसार – प्राचीन भारत का इतिहास
1. 🏛️ सिंधु घाटी सभ्यता (c. 3300–1900 ई.पू.)
- उन्नत शहर-योजनाएँ, जल निकासी, सार्वजनिक कुएँ और स्नानागार – जैसे मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, धारोहर आदि
- कृषि, पशु पालन, धातु कला, व्यापार (स्थानीय और समुद्री मार्ग)
2. 🪶 वैदिक काल (1500–600 ई.पू.)
- ऋग्वेद, याजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद की रचना—हिंदू धर्म की नींव
- सामाजिक संरचना – वर्ण व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र)
- व्रज-जातिकाल का अंत, महाजनपदों का उभार (16 महाजनपद)
3. 🛡️ मगध, नंद और प्रारंभिक साम्राज्य
- 16 महाजनपदों में मगध का उदय, लोहे के उपयोग से कृषि एवं औद्योगिक विकास
- नंद वंश और उनके केन्द्रित प्रशासन का विकास
4. 🤴 मौर्य साम्राज्य (322–185 ई.पू.)
- चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा स्थापना, चाणक्य/कौटिल्य की सहायता, 'अर्थशास्त्र'
- धर्मराज अशोक: कलिंग युद्ध, बौद्ध धर्म अपनाना, धर्मादेश, पिला-शिलालेख एवं प्रशासनिक एकता
- विदेशी दूतों (जैसे मेगस्थनीज़), राजधानियाँ: पाटलिपुत्र, तक्षशिला, उज्जयिनी
5. 📿 बौद्ध, जैन दर्शन और वैदिक-शास्त्रीय परंपराएं (c. 600–300 ई.पू.)
- महावीर (जैन धर्म), गौतम बुद्ध (बौद्ध धर्म), उपनिषदों, ब्राह्मणों का विकास
- रणनीतिक सामाजिक और धार्मिक परिवर्तन, समावेशी सामाजिक दृष्टिकोण ।
6. 🏰 गुप्त साम्राज्य (c. 320–550 ई.पू.)
- चंद्रगुप्त I, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त II – 'स्वर्ण युग' कला, साहित्य, विज्ञान, अंकगणित में विकास
- कलिदास, आर्यभट्ट, वाराहमिहिर, नालंदा विश्वविद्यालय
- स्कल्प्चर, मंदिर, अजंता-पुलकेश्वर चित्रकला, लौह स्तंभ
7. 🏹 उत्तर-गुप्त एवं पश्चात साम्राज्य
- हुण, राष्ट्रकूट, पाल वंश, मोऋखर, मलवा, हास् वर्धन का उदय – भारतीय उपमहाद्वीप में विभेदन काल
8. 🌿 दक्षिण भारतीय राजवंश
- चोल, पांड्य, चालुक्य, पल्लव – व्यापार, साहित्य, वास्तुकला (महाबलीपुरम, ठप्पान सम्राट), समुद्री संपर्क
9. 🖼️ कला, साहित्य, विज्ञान और शिक्षा
- महाभारत, रामायण, पुराण, उपनिषद, जाटक कथाएँ – सांस्कृतिक साहित्य
- देवस्थान, मठ, विश्वविद्यालय—नालंदा, तक्षशिला और अन्य केंद्र।
- वैज्ञानिक योगदान: आर्यभट्ट (ज्यामिति, त्रिकोणमिति), चरक, सुश्रुत (चिकित्सा), लौह स्तंभ
10. 🌐 व्यापार, संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय संपर्क
- उत्तरी भारत में आंतरिक व्यापार, दक्षिण-पूर्व तथा पश्चिमी सीमाओं से समुद्री मार्ग
- मौद्रिक प्रणाली – पंच-मार्क सिक्के, सुन चांदी चिह्न, तांबे की मुद्रा
काल / वंश | समय-सीमा |
---|---|
सिंधु घाटी सभ्यता | 3300–1900 ई.पू. |
वैदिक काल | 1500–600 ई.पू. |
महाजनपद व प्रारंभिक साम्राज्य | 600–322 ई.पू. |
मौर्य साम्राज्य | 322–185 ई. पू. |
बौद्ध-जैन आंदोलन | 600–300 ई.पू. |
गुप्त साम्राज्य | 320–550 ई.पू. |
पश्चात गुप्त काल व छोटे राजवंश | 550–650 ई.पू. |
दक्षिणीय राजवंश | 300 ई.पू.–650 ई.पू. |
📚 NCERT के अनुसार – प्राचीन भारत का इतिहास (विस्तारित)
11. 🏛️ कला और वास्तुकला
- मौर्य काल: शिलापट्ट जैसे अशोक स्तंभ, सांची और सारनाथ स्तूप; मानव-आकृति की मूर्तियां
- स्कूल ऑफ़ आर्ट: गांधारा, मथुरा, अमरावती व सारनाथ; गुफा मंदिर जैसे अजंता–एल्लोरा, भद्रयानी चेरीपुत आदि
12. 🎓 शिक्षा और विश्वविद्यालय
- तक्षशिला: मौर्य राजाओं के लिए शिक्षा का केंद्र, चाणक्य, बुद्धिजीवियों का निवास
- नालंदा व विक्रमशिला: विदेशों तक प्रसिद्ध, चीनी यात्री ह्युएन त्सांग का आदर्श केंद्र
13. 📜 शिलालेख एवं मुद्राएं
- गधवा शिलालेख: गुप्त युग की दान‑संस्थाओं का प्रमाण, अंक लेखन द्वारा सफल आर्थिक व्यवस्था
- कॉपर-पीट प्लेट: कानूनी अभिलेख, दक्षिण भारत के पाल भाव से संग्रहित
- पंच-मार्क्ड सिक्के (कार्शपना): 6वीं सदी ई.पू. से प्रारंभ, व्यापार में क्रांति
14. 🔬 विज्ञान, गणित और चिकित्सा
- गणित: दशांश प्रणाली, शून्य की खोज, त्रिकोणमिति (आयार्यभट्ट, वराहमिहिर)
- खगोल विज्ञान: ग्रहों के अध्ययन, खगोलीय घटनाओं की गणना, पृथ्वी की परिक्रमा की अवधारणा
- चिकित्सा: चरक‑संहित और सुश्रुत‑संहित, शल्यचिकित्सा और आयुर्वेद की बारीक व्यवस्था
- भारतीय लोहे की कला: वूट्ज़ इस्पात का उत्पादन, अचूक आयरन पिलर की तकनीकी उपलब्धि
15. 🌐 व्यापार, संस्कृति एवं अंतर्राष्ट्रीय संपर्क
- पंच-मार्क्ड सिक्का प्रणाली से व्यापार का विकास; समुद्री मार्ग के माध्यम से विदेशों तक व्यापार विस्तार
- छायाग्राही रस, टेक्सटाइल थोक निर्यात; व्यापारी-गिल्ड एवं अधिनियमित कर प्रणाली
16. 🧠 ब्रह्मचर्य, दर्शन व धर्म
- पाणिनि का व्याकरण (अष्टाध्यायी) – भाषाविज्ञान की नींव
- वैदिक, बौद्ध, जैन धर्मों का उदय; वैदिक-शास्त्रीय समाज के नैतिक व सांस्कृतिक बदलाव
17. 🔍 विशेष स्थान
- आर्य भूगोल और खगोलिक गवेषण – जैसे ढोलावीरा में संभावित ज्योतिष वेधशाला
- सूर्य पूजा की परंपरा: हरप्पा से गुप्त युग तक, देवालय और मंदिर
📚 NCERT के अनुसार – प्राचीन भारत का इतिहास (विस्तारित)
1. 🏙️ सिंधु घाटी सभ्यता का प्रमुख नगर – मोहनजोदड़ो
सिंधु घाटी सभ्यता का प्रमुख नगर मोहनजोदड़ो था, जो वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित है। यह नगर लगभग 2600 ईसा पूर्व में विकसित हुआ था और इसे इस सभ्यता के सबसे सुनियोजित एवं विकसित नगरों में से एक माना जाता है।
मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ है "मृतकों का टीला"। यहाँ की नगर योजना अद्वितीय थी—सीधी सड़कों का जाल, पक्के ईंटों से बने मकान, एक उत्कृष्ट जल निकासी प्रणाली, सार्वजनिक स्नानागार, और अनाज भंडारण के भव्य भवन इस नगर की विशिष्ट विशेषताएँ थीं।
नगर का सबसे प्रसिद्ध अवशेष है ‘महान स्नानागार’ (Great Bath), जो ईंटों से निर्मित एक बड़ा जलाशय था। ऐसा माना जाता है कि इसका उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों या सामाजिक कार्यक्रमों के लिए किया जाता था।
मोहनजोदड़ो की खुदाई से अनेक मूर्तियाँ, मुहरें, धातु की वस्तुएँ और लिपि प्राप्त हुई हैं, जो उस समय की समृद्ध संस्कृति, कला एवं तकनीकी उन्नति को दर्शाती हैं। यह नगर व्यापार, कृषि और प्रशासन का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था।
अपने सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के कारण यूनेस्को ने मोहनजोदड़ो को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी है।
📚 NCERT के अनुसार – प्राचीन भारत का इतिहास (विस्तारित)
2. 🚰 हड़प्पा सभ्यता में जल निकासी की व्यवस्था
हड़प्पा सभ्यता की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक थी इसकी उन्नत और संगठित जल निकासी प्रणाली। यह प्राचीन नगर नियोजन का एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करती है, जो आधुनिक नगरों को भी प्रेरणा देती है।
इस सभ्यता के नगरों में हर घर को स्वतंत्र जल निकासी नाली से जोड़ा गया था। ये नालियाँ पक्की ईंटों से बनी थीं और उन्हें ढकने के लिए स्लैब्स का प्रयोग किया जाता था, जिससे सफाई और सुरक्षा सुनिश्चित होती थी।
सभी घरों से निकलने वाला पानी सार्वजनिक नालियों में प्रवाहित होता था, जो नगर की सड़कों के किनारे-किनारे व्यवस्थित रूप से बनाई गई थीं। ये मुख्य नालियाँ ढलान के अनुसार बनाई जाती थीं ताकि जल का प्रवाह स्वाभाविक रूप से हो सके।
कई स्थानों पर सेप्टिक टैंक-जैसी संरचनाएँ भी पाई गई हैं, जहाँ पानी को फिल्टर कर बाहर भेजा जाता था। यह प्रदर्शित करता है कि हड़प्पा के लोग स्वच्छता, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संतुलन के प्रति सजग थे।
सिंधु घाटी सभ्यता की यह जल निकासी व्यवस्था दर्शाती है कि 2500 ईसा पूर्व के आसपास भी भारत में नगर नियोजन और सार्वजनिक स्वच्छता के प्रति अत्यंत जागरूकता थी।
📚 NCERT के अनुसार – वैदिक सभ्यता और उसका प्रमुख ग्रंथ
3. 📖 वैदिक सभ्यता का प्रमुख ग्रंथ – ऋग्वेद
वैदिक सभ्यता का सबसे प्राचीन और प्रमुख ग्रंथ ऋग्वेद है। इसे संस्कृत भाषा में रचित सबसे प्राचीन साहित्य माना जाता है और यह भारत की वैदिक संस्कृति, धर्म, समाज और ज्ञान की मूलधारा को दर्शाता है।
ऋग्वेद में कुल 1,028 ऋचाएँ (मंत्र) हैं, जो 10 मंडलों में विभाजित हैं। इनमें प्रमुख देवताओं जैसे इंद्र, अग्नि, वरुण, सोम आदि की स्तुति की गई है। ये मंत्र यज्ञों में उच्चारित किए जाते थे और इनका सामाजिक तथा धार्मिक जीवन में अत्यंत महत्व था।
ऋग्वेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह तत्कालीन समाज, कृषि, पशुपालन, युद्ध, राजनीति और अर्थव्यवस्था के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि वैदिक समाज घुमंतू से कृषक और संगठित समाज की ओर अग्रसर हो रहा था।
ऋग्वेद की रचना लगभग 1500 ईसा पूर्वविश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक है।
📚 NCERT के अनुसार – वैदिक धर्म और देवता
4. 🔱 ऋग्वेद में वर्णित प्रमुख देवता
ऋग्वेद में अनेक देवताओं की स्तुति की गई है, जिन्हें प्रकृति से संबंधित शक्तियों के रूप में पूजा गया। ये देवता मुख्यतः तीन वर्गों में विभाजित हैं: आकाशीय, वायुमंडलीय और पृथ्वी संबंधी देवता। नीचे प्रमुख देवताओं का विवरण दिया गया है:
- 1. इंद्र (वर्षा और युद्ध के देवता): ऋग्वेद के सबसे प्रमुख देवता। उन्हें वज्रधारी कहा गया है और वे असुर वृत्र का संहार करते हैं।
- 2. अग्नि (अग्निदेव): यज्ञों के माध्यम से देवताओं और मनुष्यों के बीच दूत माने जाते हैं। हर वैदिक यज्ञ में इनका आवाहन होता है।
- 3. वरुण (न्याय और जल के देवता): ऋत (ऋतु/नैतिक व्यवस्था) के रक्षक, जो पापों का दंड देते हैं।
- 4. वायु (पवन देव): वायु के अधिपति, प्राणशक्ति के प्रतीक।
- 5. सोम: सोम एक पौधा भी है और देवता भी, जिन्हें अमृत का द्रव्य कहा गया। उन्हें पीकर देवता शक्तिशाली होते हैं।
- 6. सूर्य (सविता): प्रकाश और जीवन के स्रोत, उन्हें ऋग्वेद में सर्वव्यापी और शुभकारी बताया गया है।
- 7. उषा (प्रभात की देवी): नारी रूप में वर्णित, जो अंधकार को हटाकर प्रकाश लाती हैं।
- 8. पृथ्वी और द्यौस्: भूमि और आकाश के प्रतीक, जिन्हें माता-पिता के रूप में वर्णित किया गया है।
ऋग्वेद में इन देवताओं की स्तुति मंत्रों के माध्यम से की गई, जिनमें प्रकृति के प्रति गहन श्रद्धा, भय और कृतज्ञता प्रकट होती है। देवताओं की यह अवधारणा वैदिक संस्कृति की धार्मिक सोच और जीवन-दर्शन को दर्शाती है।
📚 NCERT के अनुसार – प्राचीन भारत में राजनीतिक विकास
5. 🏰 महाजनपदों की संख्या
वैदिक काल के पश्चात भारत में जन और जनपदों का विकास हुआ, जो आगे चलकर महाजनपद कहलाए। इनका उल्लेख बौद्ध ग्रंथों जैसे अंगुत्तर निकाय तथा जैन ग्रंथों में भी मिलता है।
महाजनपदों की कुल संख्या: 16
ये 16 महाजनपद उत्तर भारत और पूर्वी भारत में फैले हुए थे। इनका उदय छठी शताब्दी ईसा पूर्व के समय हुआ और यहीं से भारत में राजनैतिक एकीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। कुछ प्रमुख महाजनपद इस प्रकार हैं:
- 1. मगध – सबसे शक्तिशाली महाजनपद, जिससे मौर्य साम्राज्य का उदय हुआ।
- 2. कोशल – वर्तमान उत्तर प्रदेश का क्षेत्र। राजा प्रसेनजित इसके प्रसिद्ध शासक थे।
- 3. वत्स – इसकी राजधानी कौशांबी थी।
- 4. अवंति – पश्चिमी भारत में स्थित, उज्जयिनी इसकी राजधानी थी।
- 5. कुरु – वैदिक काल के प्रसिद्ध राजवंश का विकास इसी क्षेत्र में हुआ।
- 6. पंचाल – विद्या, संस्कृति और युद्धकला के लिए प्रसिद्ध।
- 7. अंगा, मल्ल, शूरसेन, गांधार आदि भी महत्वपूर्ण महाजनपदों में शामिल थे।
इन महाजनपदों में से कुछ राज्यतंत्र थे और कुछ गणतांत्रिक व्यवस्था
📚 NCERT के अनुसार – बौद्ध धर्म का आरंभ
6. 🕉️ बुद्ध ने अपना पहला उपदेश कहाँ दिया था?
गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था, जो वर्तमान उत्तर प्रदेश के वाराणसी के पास स्थित है। इस ऐतिहासिक घटना को धर्मचक्र प्रवर्तन
यह उपदेश उन्होंने पाँच भिक्षुओं को दिया था, जो उनके पूर्व साथी थे। इनका नाम था: कोंडञ्ञ, वप्प, भद्दिय, महानाम और अस्सजि। इन पाँचों ने इस उपदेश को सुनकर बुद्ध की शिक्षा को स्वीकार किया और वे पहले संघ (संगठन) के सदस्य बने।
इस उपदेश में बुद्ध ने चार प्रमुख सिद्धांत बताए, जिन्हें चार आर्य सत्य (Four Noble Truths) कहा जाता है:
- दुख – जीवन में दुःख है।
- दुख समुद्धय – दुःख का कारण तृष्णा है।
- दुख निरोध – तृष्णा का अंत दुःख का अंत है।
- मार्ग – अष्टांगिक मार्ग ही दुःख से मुक्ति का उपाय है।
सारनाथ में दिए गए इस उपदेश के बाद से ही बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार प्रारंभ हुआ। यह स्थल आज भी एक महत्वपूर्ण बौद्ध तीर्थस्थल के रूप में जाना जाता है और यहाँ धमेख स्तूप स्थित है जो उस घटना की स्मृति में बना है।
📚 NCERT के अनुसार – जैन धर्म और तीर्थंकर परंपरा
7. 🧘♂️ जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर कौन थे?
जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे भगवान महावीर, जिनका मूल नाम था वर्धमान। उनका जन्म लगभग 599 ईसा पूर्व में कुंडग्राम (वर्तमान बिहार) में हुआ था। वे क्षत्रिय कुल से थे और उनका संबंध लिच्छवि वंश से था।
महावीर ने 30 वर्ष की आयु में संसार का त्याग कर दीक्षा ली और लगभग 12 वर्षों तक कठोर तपस्या और साधना की। अंततः उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे कहलाए, जिससे उनके अनुयायियों को "जैन" कहा गया।
उन्होंने अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह — इन पाँच महाव्रतों की शिक्षा दी। उनके अनुसार आत्मा की मुक्ति तभी संभव है जब जीव इन व्रतों का पालन करते हुए कर्मों से मुक्त हो जाए।
महावीर ने अपना धर्म प्राकृत भाषा में उपदेश दिया ताकि आम जनता भी उसे समझ सके। उन्होंने अपने विचारों का प्रचार जन-जन तक पहुँचाया और एक संगठित जैन संघ की स्थापना की।
उनका निर्वाण 527 ईसा पूर्व में पावापुरी (बिहार) में हुआ। वहाँ पर आज जलमंदिर एक प्रमुख तीर्थस्थल है।
विशेषता | विवरण |
---|---|
तीर्थंकर क्रम | 24वें (अंतिम) |
नाम | वर्धमान महावीर |
जन्म स्थान | कुंडग्राम, बिहार |
ज्ञान प्राप्ति | 12 वर्ष की तपस्या के बाद |
निर्वाण | पावापुरी, 527 ईसा पूर्व |
सिद्धांत | पंच महाव्रत, आत्म-शुद्धि, अहिंसा पर बल |
📚 NCERT के अनुसार – महावीर स्वामी का जीवन परिचय
8. 🌟 महावीर स्वामी का जन्म और निर्वाण
जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर, भगवान महावीर का जन्म लगभग 599 ईसा पूर्व में कुंडग्राम नामक स्थान पर हुआ था, जो वर्तमान बिहार राज्य के भागलपुर जिले के पास माना जाता है। उनके पिता का नाम सिद्धार्थ और माता का नाम त्रिशला था।
महावीर ने 30 वर्ष की आयु में संसार का त्याग कर तपस्या आरंभ की और लगभग 12 वर्षों की कठोर साधना के बाद कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य और अचौर्य के सिद्धांतों का प्रचार किया।
उनका निर्वाण लगभग 527 ईसा पूर्व में पावापुरी नामक स्थान पर हुआ, जो बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित है। पावापुरी आज भी जैन तीर्थयात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है।
घटना | स्थान | वर्ष (लगभग) |
---|---|---|
जन्म | कुंडग्राम (बिहार) | 599 ईसा पूर्व |
निर्वाण | पावापुरी (बिहार) | 527 ईसा पूर्व |
📚 NCERT के अनुसार – मौर्य साम्राज्य का इतिहास
9. ⚔️ मौर्य साम्राज्य की स्थापना किसने की थी?
मौर्य साम्राज्य की स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने की थी। उन्होंने लगभग 322 ईसा पूर्व में नंद वंश का अंत करके सत्ता संभाली और मौर्य साम्राज्य की नींव रखी।
चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने गुरु और सलाहकार चाणक्य (कौटिल्य) की मदद से एक विशाल और संगठित साम्राज्य का निर्माण किया। उनका शासनकाल भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है।
मौर्य साम्राज्य का विस्तार चंद्रगुप्त के बाद उनके पुत्र बिंदुसार और पोते अशोक के शासनकाल में और भी हुआ। अशोक के समय मौर्य साम्राज्य अपने चरम पर था।
मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी, जो वर्तमान पटना के क्षेत्र में स्थित है।
तथ्य | विवरण |
---|---|
संस्थापक | चंद्रगुप्त मौर्य |
स्थापना वर्ष | लगभग 322 ईसा पूर्व |
प्रमुख सलाहकार | चाणक्य (कौटिल्य) |
राजधानी | पाटलिपुत्र |
साम्राज्य का विस्तार | बिंदुसार और अशोक के शासनकाल में |
📚 NCERT के अनुसार – चाणक्य के अन्य नाम
10. 🧠 चाणक्य को और किस नाम से जाना जाता है?
प्राचीन भारतीय इतिहास में चाणक्य को कई नामों से जाना जाता है, जिनमें प्रमुख हैं:
- कौटिल्य – यह नाम उनके वंश या कुल के आधार पर प्रसिद्ध है।
- विष्णु गुप्त – यह उनका व्यक्तिगत नाम माना जाता है।
चाणक्य ने महान राजनीतिक ग्रंथ अर्थशास्त्र की रचना की, जिसमें शासन, राजनीति, अर्थव्यवस्था, और प्रशासन के सिद्धांत बताए गए हैं। वे मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु और सलाहकार थे।
नाम | विवरण |
---|---|
चाणक्य | सामान्य रूप में प्रसिद्ध नाम |
कौटिल्य | कुल या वंश नाम |
विष्णु गुप्त | व्यक्तिगत नाम |
📚 NCERT के अनुसार – अशोक के काल में धर्म
11. 🕉️ अशोक के काल में कौन-सा धर्म सबसे अधिक फैला?
मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल में बौद्ध धर्म सबसे अधिक फैला। अशोक ने कालिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म को अपनाया और इसके प्रचार-प्रसार में विशेष भूमिका निभाई।
उन्होंने अपने शिलालेखों (अशोक स्तंभों और चट्टान शिलालेखों) पर बौद्ध धर्म के सिद्धांतों, जैसे अहिंसा, करुणा, और धर्म की महत्ता को लिखवाया। अशोक ने विदेशों में बौद्ध मिशनों को भेजा, जिससे बौद्ध धर्म श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, और अन्य एशियाई देशों तक पहुँचा।
उनके शासनकाल में बौद्ध मठों और स्तूपों का निर्माण हुआ, जो बौद्ध धर्म के सांस्कृतिक और धार्मिक विकास का प्रतीक है।
तथ्य | विवरण |
---|---|
प्रमुख धर्म | बौद्ध धर्म |
धर्म अपनाने का कारण | कालिंग युद्ध के बाद अहिंसा की सीख |
प्रचार-प्रसार के तरीके | शिलालेख, मिशनरियाँ, स्तूप और मठ निर्माण |
📚 NCERT के अनुसार – अशोक और धर्म परिवर्तन
12. 🕉️ अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद किस धर्म को अपनाया?
मौर्य सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध (लगभग 261 ईसा पूर्व) के बाद बौद्ध धर्म को अपनाया। इस युद्ध में भारी जनहानि और रक्तपात देखकर अशोक ने अहिंसा और करुणा के मार्ग पर चलने का निर्णय लिया।
उन्होंने बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को अपना कर अपने शासन में न्याय, सहिष्णुता और धर्म का प्रचार किया। अशोक के शिलालेखों में भी बौद्ध नैतिकता की बातें मिलती हैं।
📚 NCERT के अनुसार – सांची का स्तूप
13. 🏛️ सांची का स्तूप किससे संबंधित है?
सांची का स्तूप बौद्ध धर्म से संबंधित है। यह भारत के मध्य प्रदेश राज्य के सांची कस्बे में स्थित है।
यह स्तूप मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल (लगभग 3री शताब्दी ईसा पूर्व) में निर्मित हुआ था और यह बौद्ध धर्म के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है।
सांची का मुख्य स्तूप बुद्ध के अवशेषों को समर्पित माना जाता है, और यहाँ कई सुंदर झरोखेदार गेटवे (toranas) और चित्रकारी भी हैं जो बौद्ध कथा और शिक्षाओं को दर्शाते हैं।
यह स्थल UNESCO विश्व धरोहर स्थल के रूप में भी मान्यता प्राप्त है और भारतीय स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
📚 NCERT के अनुसार – गुप्त काल को 'स्वर्ण युग' क्यों कहा जाता है?
14. ✨ गुप्त काल को 'स्वर्ण युग' क्यों कहा जाता है?
गुप्त काल (लगभग 4ठी से 6ठी सदी ईस्वी तक) को भारतीय इतिहास में 'स्वर्ण युग' कहा जाता है क्योंकि इस काल में कला, विज्ञान, साहित्य, और सांस्कृतिक गतिविधियों में अभूतपूर्व उन्नति हुई।
इस काल में प्रमुख कवि और विद्वान जैसे कालिदास, चाणक्य और वाराहमिहिर ने अपने अद्भुत योगदान दिए। वास्तुकला, मूर्तिकला, और चित्रकला के क्षेत्र में भी इस समय कई महान कार्य हुए।
गुप्त शासकों ने एक समृद्ध और सुव्यवस्थित प्रशासन चलाया, जिससे आर्थिक समृद्धि और सामाजिक स्थिरता बनी रही। विज्ञान और गणित में भी इस काल में महत्वपूर्ण खोजें हुईं, जैसे शून्य का प्रयोग।
इस काल की विशेषता है कि यहाँ धार्मिक सहिष्णुता भी थी, जहां विभिन्न धर्मों का संरक्षण और प्रोत्साहन हुआ।
📚 NCERT के अनुसार – आर्यभट और वराहमिहिर
15. 👨🏫 आर्यभट और वराहमिहिर किस काल के प्रसिद्ध विद्वान थे?
आर्यभट और वराहमिहिर दोनों गुप्त काल (लगभग 4ठी से 6ठी शताब्दी ईस्वी) के प्रसिद्ध विद्वान थे।
आर्यभट गणित और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में महान विद्वान थे। उन्होंने शून्य और दशमलव प्रणाली का विकास किया, और ग्रहों की गति पर महत्वपूर्ण अध्ययन किया।
वराहमिहिर भी गणित, खगोल विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में विशेषज्ञ थे। उनका प्रसिद्ध ग्रंथ 'पंचसिद्धांत' और 'बृहत्तसंहिता' महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।
इन विद्वानों ने भारतीय वैज्ञानिक और गणितीय ज्ञान को एक नई ऊँचाई पर पहुँचाया, जिसका प्रभाव विश्वभर में महसूस किया गया।
📚 NCERT के अनुसार – हर्षवर्धन की राजधानी
16. 🏰 हर्षवर्धन की राजधानी कहाँ थी?
प्राचीन भारत के प्रसिद्ध सम्राट हर्षवर्धन की राजधानी नालंदा थी।
नालंदा वर्तमान बिहार राज्य में स्थित एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र था। यहाँ विश्वविद्यालय भी था, जो उस समय शिक्षा का प्रमुख
📚 NCERT के अनुसार – बौद्ध धर्म के त्रिरत्न
17. ☸️ बौद्ध धर्म के त्रिरत्न क्या हैं?
बौद्ध धर्म के त्रिरत्न (Three Jewels or Triple Gem) निम्नलिखित हैं:
- बुद्ध – जो जाग्रत और प्रेरक गुरु हैं।
- धर्म – बुद्ध के द्वारा बताए गए उपदेश और सच्चाई का मार्ग।
- संघ – बुद्ध के अनुयायियों का समुदाय, जो धर्म का पालन करते हैं।
त्रिरत्न को स्वीकार कर बौद्ध धर्म के अनुयायी अपने जीवन में शांति और मोक्ष की ओर बढ़ते हैं।
📚 NCERT के अनुसार – बौद्ध परिषदों की संख्या
18. 🕉️ बौद्ध परिषदों की कुल संख्या कितनी थी?
बौद्ध धर्म के इतिहास में कुल चार प्रमुख बौद्ध परिषदें हुई थीं।
ये परिषदें बुद्ध के उपदेशों को संकलित करने, उनका संरक्षण करने और धर्म की शुद्धता बनाए रखने के लिए आयोजित की गई थीं।
प्रथम परिषद से लेकर चतुर्थ परिषद तक का क्रम बौद्ध धर्म के विकास में महत्वपूर्ण था।
📚 NCERT के अनुसार – अजंता-एलोरा की गुफाएँ
19. 🏞️ अजंता-एलोरा की गुफाएँ किस धर्म से संबंधित हैं?
अजंता और एलोरा की गुफाएँ मुख्य रूप से बौद्ध धर्म, जैन धर्म और हिंदू धर्म से संबंधित हैं।
अजंता की गुफाएँ विशेष रूप से बौद्ध धर्म से जुड़ी हैं, जहां बौद्ध भिक्षुओं के लिए विहार और मंदिर बनाए गए थे। इन गुफाओं में बौद्ध चित्रकला और मूर्तिकला की उत्कृष्ट कला देखने को मिलती है।
वहीं, एलोरा की गुफाएँ तीन धर्मों के संगम का प्रतीक हैं — यहाँ बौद्ध, जैन और हिंदू गुफाएँ मौजूद हैं। यह वास्तुकला और धार्मिक सहिष्णुता का अद्भुत उदाहरण है।
📚 NCERT के अनुसार – नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना
20. 🏫 नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना किसने की थी?
प्राचीन भारत के महान शासक सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने 5वीं सदी ईस्वी में नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।
नालंदा विश्वविद्यालय शिक्षा, वेदांत, बुद्ध धर्म, न्याय, आयुर्वेद, गणित, खगोल विज्ञान, और अन्य विषयों का एक प्रमुख केंद्र था।
यह विश्वविद्यालय न केवल भारत से बल्कि विदेशों से भी विद्यार्थियों और विद्वानों को आकर्षित करता था। चीनी यात्री ह्युएन त्सांग ने भी यहाँ शिक्षा ग्रहण की थी।